
ये बुझी, बुझी से राख मे,
क्यों ये अंगारे दहकने लगे,
अपनी हसरतों की आग है शायद;
जो ये शोले फिर सुलगने लगे|
दफना कर तमन्नाओं को अपनी,
जीं रहे थे बेमतलब जिंदगी युँ ही,
पनपते रहे दिलमे वो अरमान शायद;
जो पत्ते सुखी शाख पर, फिर फुटनें लगे|
मंजिल के लिये दिल फिर तडपने लगा,
फिर अनजान राहों से प्यार होने लगा,
मंजिल मिले, न मिले शायद;
नामुमकीन सफर के लिये फिर तरसने लगे|
दुनिया की रस्मों को छोड भी दिजिये,
अब दिल की ही राह पकड कर चलिये,
अपनी खुली सांस का असर है शायद;
जो मुरझाये हुए फुल फिर महकने लगे|
© Manish Hatwalne
(Originally written on : 25 Feb 2010)
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Hi Manish,
Sachin from the REBT batch here. What a thoughtful poem, this one! Tujhi pratibha afaat ahe. And you are allowing it to blossom… that’s really inspirational!
Shall call you soon… its time to catch up!
Sachin