Little starry walks…


These days I go for evening walks with my son
He tells me about the upcoming blue moon
He continues to chatter about Mars, and Venus
As he keeps gazing at the starlit sky above us

He tells me how to distinguish a planet from a star
The Illuminated reflection, versus the flickering fire
He explains helium fusion, the role of the atmosphere
Something I'd learnt in childhood, but lost it somewhere

He talks about the brightest celestial body - Sirius star
The Andromeda galaxy, the nearest one, but yet so far
The discussion moves to Harry Potter inevitably
If not for these walks, I'd have missed it all easily

The excited voice when he shares all these stories
An infectious joy in those dancing, twinkling eyes
The way my heart glows, they must be the stars.
I kind of love these lovely, little starry walks...

~ Manish (30/10/2020)

Featured image by StockSnap from Pixabay.

Pravasi & Safar

We all know how difficult the lockdowns were for the migrant labourers. We have seen those photos, video footage and have read their stories.

These two short animated videos depict all those stories powerfully, each visual will bring back those memories. Both these videos are in Hindi with voiceover by Taapsee Pannu. Do watch…

Pravasi by Taapsee Pannu

Safar by Goonj, voice by Taapsee Pannu

Here are few lines from an old poem – मेरे अपने…

सबकी तरह शहर वो आये,
साथ मे चंद अरमान ही थे
बेहतर ज़िंदगी की खातिर
बदतर दिनों से वो लडते थे

कुछ लोग ठेला चलाते थे
कुछ तो कारीगर अच्छे थे
मजदूर थे, मुफलिस थे वो
मेहनत के निवाले सच्चे थे


वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा…

जो ख़ुशबू बनकर महकती हो
साँसों को आज बहकने दो
कल शायद इस सीने में,
फ़क़त धुआँ रह जायेगा.

वक़्त का क्या है,
गुज़रता है, गुज़र जायेगा…

ख्वाबों की तरह आती हो
मूंद कर पलकें छूने दो
कल शायद मर्ग-आग़ोश में,
यहीं लम्हा रह जायेगा.

वक़्त का क्या है,
गुज़रता है, गुज़र जायेगा…

जो हाथों मे तेरा हाथ है
उम्र-सफ़र यूँही चलने दो
कल शायद इन राहों पर,
कोई तन्हा रह जायेगा.

वक़्त का क्या है,
गुज़रता है, गुज़र जायेगा…

इन मासूम, नन्हे हाथों को
आज गले से लिपटने दो
कल शायद ये अक्स अपना,
अपना कहाँ रह जायेगा.

वक़्त का क्या है,
गुज़रता है, गुज़र जायेगा…

माना ख़ाक में मिल जाना है
कुछ अपना छोड़ जाने दो
कल शायद इन सितारों में,
कहीं निशाँ रह जायेगा.

वक़्त का क्या है,
गुज़रता है, गुज़र जायेगा…


पलको में छुपाये रख्खे है
आँखों मे आज उभरने दो
कल शायद हर ख़्वाब अपना,
यूँही अश्क बन जायेगा.

वक़्त का क्या है,
गुज़रता है, गुज़र जायेगा…

उम्र-भर जख़्म खाये है
आबला-पा ही चलने दो
कल शायद बैठे रहने से,
जख़्म नासूर बन जायेगा.

वक़्त का क्या है,
गुज़रता है, गुज़र जायेगा…

जो राहनुमा सितारा गुम है
तो आज यूँही भटकने दो
कल शायद इन क़दमों से,
रास्ता नया बन जायेगा.

वक़्त का क्या है,
गुज़रता है, गुज़र जायेगा…

ज़िद जो हमने ठानी है
मंज़िल को अब तरसने दो
कल शायद इन राहों पर,
अपना गुमाँ रह जायेगा.

वक़्त का क्या है,
गुज़रता है, गुज़र जायेगा…

माना ख़ाक में मिल जाना है
कुछ अपना छोड़ जाने दो
कल शायद इन सितारों में,
कहीं निशाँ रह जायेगा.

वक़्त का क्या है,
गुज़रता है, गुज़र जायेगा…

~ Manish (25/8/2020)
© Manish Hatwalne


Credits:

‘वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा’ is a मिस्रा borrowed from famous poet Ahmad Faraz. I have based my poem on this line, with its core idea as The time will pass anyway.…’. Today (25th August) is Faraz’s death anniversary, so I decided to complete this today. This is my tribute to this great poet.

You can see the original couplet by Ahamd Faraz below –

वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा...
वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा… (PC: rekhta.org)

The featured image by Monoar Rahman Rony from Pixabay.