ख़्वाब बिखरते रहे…

बेवजह की दुनियादारी मे हम यूँ ही उलझे रहे
वक़्त गुज़रता गया, और ख़्वाब बिखरते रहे|

दिल की ही कहेंगे, दिल की ही सुनेंगे,
अपनी राह खुद चुनेंगे, बस कहते रहे|

ख़्वाहिशें अधूरी रही, जो सोचा वो न कर पाये
आँख भर आयी मगर, मुस्कुराकर सहते रहे|

किसी की किताब छपी, किसी ने ख़्वाबों की तामीर की
ठंडी आहें भरकर हम, हसरतों से उन्हे तकते रहे|

ये मजबूरियाँ अपनी है, वो ख़्वाब भी अपने थे
हकीकत जो न बन पाये, उनके लिये तरसते रहे|

न बात निकली, न ज़िक्र हुआ, दास्ताँ अपनी किससे कहे
हसती-खिलती महफ़िल मे, हम भी फिर हसते रहे|

जिंदगी कुछ यूँ गुजरी, यारी, रिश्ते, फर्ज़ निभाते रहे
‘मनिष’ तो ख़ाक हो गया, अरमाँ मगर सुलगते रहे|

© Manish Hatwalne
(Originally completed on 23/5/2017)

I had written first couplet back in 2012.  Something stays alive for so long, more like a dormant thought, and then resurfaces with sudden gush of feelings, words and makes you wonder where was it all this while… maybe flowing somewhere deep within.

So, a couplet that came spontaneously roughly 5 years ago gets transformed into this poem. Sharing it here on #WorldPoetryDay.


Featured image is from the internet, and unable to locate its origin, so can’t give credit here. But I am using it here with gratitude.

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