क्यों लिखता हूँ ?

लिखना पसंद है, इसलिये लिखता हूँ
अपनी समझ, अपने एहसास को
लफ़्ज़ों में ढालने की कोशिश करता हूँ
अंदर का दर्द, कुछ अनकही बाते,
काग़ज़ पर सजा लेता हूँ
अपनी कविताओं में अक्सर
मै ख़ुद को ढूंढता रहता हूँ |

तुम कहती हो, पढ़कर सुनाओ
मै ढंग से पढ़ नही पाता हूँ
कभी तेज़, कभी बुदबुदाता हूँ
काग़ज़ पर लिखी अपनी कविता,
पढ़ते, गुनगुनाते हिचकिचाता हूँ
अल्फ़ाज़ मेरे जो काग़ज़ पर तो इतराते है
उन्हे कहते, सुनाते कतराता हूँ |

दुनियादारी अगर मै भी सीख लेता,
बस यूँ ही हाँ में हाँ मिला लेता,
कभी बात डटकर बोल देता,
कभी हंस कर बात टाल देता,
बातों-बातों में दिल लुभा लेता,
गर महफ़िलें मै भी सजा लेता,
तो शायद….
मै लिख नही पाता!

~ मनिष (16/5/2019)
© Manish Hatwalne


This poem is for that young, cordial girl from book-cafe who insisted that I read, recite my poems. Not sure how much she could make sense of my mumblings, but here is one for you Nishi, in the format that I prefer – written words instead of spoken words.

सात साल…….

This has happened after a long time. A poem completed in a single flow within couple of days, did not take break of several days or months to finish half-complete poem. I could stay with the intensity of emotions in the same flow to complete the poem. I thoroughly enjoyed this painful yet rewarding process after a long time, not sure about the outcoem though. But here it is, for whatever it is worth!

couple-7-years

आज सात साल हो गये
पर जैसे कल ही की बात लगती है…

बाहर बारीश, दिल मे तमन्न्ना
भीगा, सहमा सा मै बेचारा
कुछ ख्वाब थे मेरे पलकों पर
और तुम इन सब से बेअसर

किसी मासूम बच्चे की तरह
सो रही थी तुम बेखबर
कुछ रिश्ता तो नहीं था जानम
और ख्वाब युंही बुन रहे थे हम

…….

आज सात साल हो गये
और ये अजीब सी बात लगती है…

आज बंधे है हम रिश्तो से
और बीच मे है ख्वाब बिखरे से
तुम हमसफर हो, हमराह मेरे
फिर क्यों है वो गीत अधुरे?

जिंदगी की ये कैसी मजबुरी?
साथ है हम तो क्यों है दुरी?
अनगिनत ये सवाल है,
और बेजु़बां सा मलाल है

…….

आज सात साल हो गये
और ये बात करना जरूरी है…

हमे किस खुशी की तलाश है?
सबकुछ तो अपने पास है
राहें जब खुबसुरत है
मंज़िलों की क्यों जरुरत है?

आज फिर हाथ थाम लो
मेरे दिल की बात मान लो
साथ अगर हम मुस्कुरायेंगे
जवाब मिल ही जायेंगे!

© Manish Hatwalne
(2 & 3  October 2013)